ज़ुबानी दिल की दास्ताँ

उन यादों का सहारा लेकर हम चल रहे हर दम,
वो वक़्त जो गुज़रा है कैसे भूल पायेंगे हम?
कभी तुम्हारे हाथों में हाथ लेकर चले,
कभी तुम्हारे नरम केशों में अपना मुख छुपाते चले,
कभी तुम्हारे कोमल गुलाबी होंठो को चूमते चले,
कभी तुम्हारी साँसों को अपने में समाते चले,
कभी अपने प्यार की दास्ताँ को आखों से सुनाते चले,
कभी तुम्हारे पैरों तले पिघलती बरफ बन चले, 
कभी पेड़ों की परछाईयों में चले,
कभी नदी की लहरों में तैरते चले,
कभी लहराती गुनगुनाती हवाओं में चले, 
कभी चांदनी रात में अपना परिचय ढूँढते चले,
कभी फूलों पे चले, कभी काँटो में चले, 
कभी धूप में चले, कभी छाँव में चले, 
कभी दर्द के ज़हर का घूँट-घूँट पीते चले 
कभी बेवफाई की आग में अंग अंग जलाते चले 
कभी तुम्हारे प्यार की प्यास में दम दम घुटते चले,
कभी तुम्हारी याद में हर दम मरते चले,

मगर सदा अपने दिल की बातों की वरमाला तुम्हें पहनाते चले, तुम्हें पहनाते चले|

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